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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 12 नवजागरण तथा राष्ट्रीयता का विकास (अनुभाग – एक) विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

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प्रश्न 1.

नवजागरण से क्या तात्पर्य है ? भारत में नवजागरण के कारणों पर प्रकाश डालिए। 

             या

बीसवीं शताब्दी से पूर्व भारत में नवचेतना जाग्रत करने में सहायक कारकों की व्याख्या कीजिए।

             या

उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में समाज-सुधार आन्दोलनों में सहायक किन्हीं दो कारणों को स्पष्ट कीजिए।

             या

भारत में राष्ट्रीय जागरण में सहायक किन्हीं चार कारणों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर :

नवजागरण का अर्थ

उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में एक ऐसी नवीन चेतना का उदय हुआ, जिसने देश के सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन को नवचेतना एवं नवजागरण प्रदान किया, जिसे भारतीय नवजागरण या पुनर्जागरण (Renaissance) के नाम से पुकारते हैं। “पुनर्जागरण का अर्थ विद्या, कला, विज्ञान, साहित्य और भाषाओं के विकास से लगाया जाता है। भारत में आये जागरण ने पश्चिमी सभ्यता से तर्क, समानता और स्वतन्त्रता की प्रेरणा लेकर भारत के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। इसने प्राचीन भारतीय सभ्यता में उत्पन्न दोषों को दूर करते हुए उसे प्रगति के लिए नवीन आधार और जीवन प्रदान किया। आधुनिक भारत में इस नवजागरण के फलस्वरूप नये सांस्कृतिक एवं सामाजिक मूल्यों का उदय हुआ। प्रारम्भ में नवजागरण आन्दोलन केवल एक बौद्धिक जागृति थी, किन्तु बाद में इस आन्दोलन के फलस्वरूप देश में अनेक महत्त्वपूर्ण सामाजिक तथा धार्मिक सुधार हुए।

भारत में नवजागरण के कारण

भारत में नवजागरण के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे –

1. हिन्दू धर्म व समाज के दोष – उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज और हिन्दू धर्म में अनेक दोष उत्पन्न हो गये थे; जैसे-जाति-प्रथा, सती–प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-पुनर्विवाह निषेध, मूर्तिपूजा, छुआछूत, अन्धविश्वास आदि। भारतीय समाज और धर्म की रक्षा के लिए समाज-सुधारकों ने प्रत्येक दोषों और कुरीतियों को दूर करना आवश्यक समझा।

2. राष्ट्रीयता की भावना का विकास – सन् 1857 ई० की क्रान्ति ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न कर दी। इसके फलस्वरूप भारतवासी अपने अधिकारों के लिए तथा समाज-धर्म में व्याप्त बुराइयों को। दूर करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो गये। इससे देश में नवजागरण की लहर उत्पन्न हो गयी।

3. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार – भारत के राष्ट्रीय नवजागरण में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीयों का परिचय यूरोप के ऐसे विचारकों से हुआ जो राष्ट्रीयता, लोकतन्त्र तथा स्वतन्त्रता की भावना से परिपूर्ण थे। इससे भारतीयों की मनोवृत्ति में परिवर्तन आने लगा और वे गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए व्याकुल हो उठे।

4. महान् सुधारकों का जन्म – उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के सौभाग्य से देश के विभिन्न भागों में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, सर सैयद अहमद खाँ, गुरु राम सिंह तथा केशवचन्द्र सेन जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया। ये उच्चकोटि के विद्वान् तथा सच्चे धर्म-प्रेमी थे। इनमें आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय तथा समाजकल्याण की भावनाएँ प्रबल थीं। इनके प्रयत्नों के फलस्वरूप ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, अलीगढ़ आन्दोलन आदि सुधारवादी आन्दोलनों का जन्म हुआ।

5. प्रेस तथा साहित्य का योगदान – उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्द्ध भाग में अंग्रेजी तथा देशी भाषाओं में अनेक समाचार-पत्र तथा पत्रिकाएँ छपने लगी थीं। सुधारों के लेख प्राय: समाचार-पत्रों में छपते रहते थे। लोकमान्य तिलक, बंकिम चन्द्र  चटर्जी, माइकल मधुसूदन दत्त, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आदि ने जनता को राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत साहित्य प्रदान किया। इनके द्वारा लिखी पुस्तकें देश के विभिन्न भागों में पहुँच गयीं, जिनसे सुधारों के विचारों का खूब प्रचार-प्रसार हुआ।

6. यातायात तथा डाक-व्यवस्था का प्रभाव – ब्रिटिश सरकार ने भारत में अपने लाभ के लिए यातायात और संचार के साधनों का विकास किया। देश भर में रेल, डाक व तार व्यवस्था के फैल जाने से देश के एक भाग से दूसरे भाग में जाना या सम्पर्क करना आसान हो गया। इससे देश के विभिन्न भागों के लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आने लगे और परस्पर विचार-विमर्श करने लगे। इससे जनता में राष्ट्रीय चेतना का संचार होने लगा।

7. विदेशी घटनाओं का प्रभाव – इसी समय विदेशों में कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं, जिन्होंने भारतीयों पर गहरा प्रभाव डाला। इटली और जर्मनी का राजनीतिक एकीकरण (1870-71 ई०), इंग्लैण्ड के सुधार आन्दोलन (1832-67 ई०), अमेरिका में दासों की मुक्ति (1865 ई०) आदि घटनाओं ने भारतीयों के मन में भी राष्ट्रीयता की भावना का संचार किया।

8. ईसाई धर्म का प्रचार – सन् 1813 ई० के चार्टर ऐक्ट के बाद बहुत अधिक संख्या में ईसाई धर्म के प्रचारक भारत में आये। वे अपने भाषणों में हिन्दू तथा इस्लाम धर्म की कठोर शब्दों में निन्दा करते थे। वे बड़ी संख्या में हिन्दुओं, मुसलमानों तथा सिक्खों को ईसाई बनाने में सफल होने लगे। इन परिस्थितियों में हिन्दू तथा इस्लाम धर्म के शुभचिन्तकों की आँखें खुलीं और उन्होंने अपने धर्म की

बुराइयों को दूर करने के लिए प्रयास प्रारम्भ कर दिये।

प्रश्न 2.

राजा राममोहन राय के जीवन एवं मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए। 

             या

राजा राममोहन राय के व्यक्तित्व एवं किन्हीं तीन सामाजिक सुधारों का वर्णन कीजिए।

             या

राजा राममोहन राय कौन थे ? उन्हें आधुनिक भारत का जनक क्यों कहा जाता है ?

             या

ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की ? ब्रह्म समाज के योगदान पर प्रकाश डालिए। 

             या

ब्रह्म समाज की स्थापना कब हुई थी ? इसके संस्थापक कौन थे ? ब्रह्म समाज ने किन सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया ? किन्हीं चार का उल्लेख कीजिए। 

             या

ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की ? ब्रह्म समाज द्वारा किन सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने का प्रयास किया गया ? 

             या

राजा राममोहन राय के कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

             या

भारतीय नवजागरण में राजा राममोहन राय का क्या योगदान था?

             या

राजा राममोहन राय कौन थे? इनके प्रमुख योगदान का वर्णन कीजिए। 

             या

19 वीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण में राजा राममोहन राय के योगदान की विवेचना कीजिए। [2018]

उतर :

राजा राममोहन राय को भारत के नवजागरण का अग्रदूत कहा जाता है। ये पहले भारतीय थे जिन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में सुधारों के युग का श्रीगणेश किया। इन्हीं के कार्यों के परिणामस्वरूप भारत में नवजागरण की शुरुआत हुई तथा भारत आज आधुनिक रूप में हमारे सामने प्रस्तुत है। इसी कारण उन्हें ‘आधुनिक भारत का जनक’ भी कहा जाता है।

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1774 ई० को बंगाल के हुगली जिले में हुआ था। ये बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न तथा उच्चकोटि के विद्वान् थे। इन्होंने दस भाषाओं में पाण्डित्य प्राप्त किया था तथा अपना अधिकांश जीवन भारतीय समाज की बुराइयों को दूर करने में लगाया। निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाएगा कि ये भारत के नवजागरण के अग्रदूत तथा आधुनिक भारत के जनक थे

1. ब्रह्म समाज के संस्थापक – भारतीय समाज एवं धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के उद्देश्य से राजा राममोहन राय ने 20 अगस्त, 1828 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) में एक ‘आत्मीय सभा’ की स्थापना की। यही सभा आगे चलकर ‘ब्रह्म समाज’ कहलायी। शीघ्र ही यह राष्ट्रीय संस्था बन गयी। इस संस्था के माध्यम से इन्होंने ही सर्वप्रथम देश में अनेक सामाजिक-धार्मिक सुधार के कार्य किये अर्थात् ब्रह्म समाज द्वारा उन्होंने देश में नवजागरण का कार्य प्रारम्भ किया।

2. ब्रह्म समाज के आदर्श – ब्रह्म समाज के आदर्श तथा सिद्धान्त उच्चकोटि के थे। इनमें पुराने आदर्शों का समावेश तो था ही, साथ में नवीन तार्किक विचारों को भी समुचित महत्त्व दिया गया था। इन्होंने बहुदेववाद का खण्डन करते हुए एक ईश्वर की पूजा पर बल दिया। मूर्तिपूजा व धार्मिक कर्मकाण्डों तथा आडम्बरों पर इन्होंने तीव्र प्रहार किया। जाति-पाँति और ऊँच-नीच के भेदभाव का विरोध किया और लाखों लोगों को ईसाई होने से बचा लिया।

3. सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त – राजा राममोहन राय पहले भारतीय थे जिन्होंने दृढ़ संकल्प, पूर्ण विश्वास तथा गम्भीरता से भारत के पिछड़े अन्धविश्वासी समाज में नयी रोशनी का दीप जलाया। इन्होंने बाल-विवाह, सती–प्रथा, बहु-विवाह, पर्दा-प्रथा, छुआछूत आदि का जोरदार विरोध किया। इन्हीं के विचारों से प्रभावित होकर लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने 1829 ई० में सती–प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। विधवा-पुनर्विवाह को न्यायसंगत ठहराते हुए इन्होंने इसके पक्ष में जनमत तैयार किया। पुरुषों के समान ही स्त्रियों के अधिकारों का समर्थन करते हुए इन्होंने स्त्रियों के सामाजिक उत्थान का बीड़ा उठाया।

4. पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन – राजा राममोहन राय पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति के आधार पर भारत का आधुनिकीकरण करना चाहते थे। इनका मानना था कि भारत में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के बिना सामाजिक कुरीतियाँ दूर नहीं हो सकतीं। इन्हीं के विचारों से सहमत होकर लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा लागू की। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन के लिए देश में अनेक शिक्षण-संस्थाएँ खोली गयीं। ये स्त्री-शिक्षा के भी बड़े समर्थक थे।

5. राजनीतिक जागृति लाने में योगदान – यद्यपि राजा राममोहन राय ने प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में भाग नहीं लिया, किन्तु इन्होंने देश में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया तथा लोगों को एकता के सूत्र में बाँधने के प्रयास किये। इन्होंने विचारों की अभिव्यक्ति तथा प्रेस की स्वतन्त्रता पर बल दिया, जिससे लोगों में जागृति आये।। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि राजा राममोहन राय भारत में नवजागरण के अग्रदूत’ तथा आधुनिक भारत के जनक’ थे। इन्हीं के दृढ़ संकल्प तथा गम्भीर प्रयासों से भारत में सामाजिक व धार्मिक सुधारों के युग का शुभारम्भ हुआ। इसीलिए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था, “राजा  राममोहन राय ने भारत में नये युग का सूत्रपात किया। वस्तुतः वे आधुनिक भारत के जनक थे।”

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प्रश्न 3.

स्वामी दयानन्द सरस्वती का संक्षिप्त परिचय देते हुए आर्य समाज के सिद्धान्तों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। 

             या

आर्य समाज की स्थापना किसने किस मुख्य उद्देश्य से की थी ? इसके धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों का वर्णन कीजिए। इसका क्या योगदान रहा ?

             या

आर्य समाज के प्रमुख चार सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। 

             या

उन्नीसवीं शताब्दी के पुनर्जागरण में स्वामी दयानन्द के योगदान की विवेचना कीजिए। 

             या

स्वामी दयानन्द का जीवन-परिचय दीजिए।

             या

आर्य समाज की स्थापना किसने की ? इसका मुख्य कार्य क्या है ? 

             या

स्वामी दयानन्द सरस्वती कौन थे ? उनके प्रमुख कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

             या

आर्य समाज की स्थापना कब और किसके द्वारा की गयी ? इनके द्वारा किए गए किन्हीं चार समाज-सुधारों का वर्णन कीजिए। 

             या

आर्य समाज की स्थापना किसने की थी ? उनके मुख्य सिद्धान्त व कार्य का वर्णन कीजिए।

             या

भारतीय नवजागरण में स्वामी दयानन्द का क्या योगदान था?

उत्तर :

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती थे। उनका जन्म 1824 ई० में काठियावाड़ के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम मूलशंकर था। अल्प आयु में ही इनमें हिन्दू धर्म में व्याप्त आडम्बरों के प्रति विद्रोह की भावना जाग उठी। 22 वर्ष की आयु में ही इन्होंने संन्यास ले लिया। उसके बाद 15 वर्ष तक वे ज्ञान-प्राप्ति के उद्देश्य से जगह-जगह विद्वानों तथा संन्यासियों से मिलते रहे। सन् 1861 ई० में इन्होंने स्वामी विरजानन्द को अपना गुरु बनाया। तीन वर्ष तक गुरु से शिक्षा ग्रहण की तथा वेदों का गहन अध्ययन किया। वेदों ने उनकी सारी जिज्ञासाओं को शान्त किया। इन्होंने अनुभव किया कि वेदों के आधार पर भारतीय समाज का पुनः निर्माण किया जा सकता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्यों की गौरवशाली परम्पराओं की श्रेष्ठता को पुन: स्थापित करने के उद्देश्य से 10 अप्रैल, 1875 ई० में बम्बई (मुम्बई) में आर्य समाज की स्थापना की। इन्होंने भारतवासियों में अपने राष्ट्र, संस्कृति, धर्म और भाषा के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करने के अथक प्रयास किये। स्वामी दयानन्द ने हिन्दू धर्म के मूलभूत तत्त्वों पर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की।

सुधारों पर बल

धर्म-सुधार कार्य – आर्य समाज के धर्म-सुधार सम्बन्धी मूलभूत कार्य निम्नलिखित हैं –

1.आर्य समाज ने हिन्दुओं में उनके प्राचीन धर्म-ग्रन्थ वेदों के प्रति आस्था उत्पन्न की। वेदों को सत्य और सभी ज्ञान-विज्ञान का स्रोत बताकर हिन्दू धर्म व संस्कृति की श्रेष्ठता को प्रतिपादित किया। परिणामस्वरूप हिन्दुओं में आत्मविश्वास का संचार हुआ।

2.स्वामी दयानन्द ने हिन्दू धर्म को इस्लाम तथा ईसाई धर्म के खतरे से बचाया।

3.स्वामी दयानन्द ने हिन्दू धर्म पर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा।

4.हिन्दू धर्म को छोड़कर गये हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लिया। साथ ही ईसाई और मुसलमानों को भी हिन्दू धर्म स्वीकार करने के लिए आमन्त्रित किया।

5.मूर्तिपूजा, पाखण्ड तथा अन्धविश्वासों का खण्डन किया।

6.महँगे और जटिल हिन्दू संस्कारों के स्थान पर सुलभ और सरल संस्कार की विधि अपनायी।

समाज-सुधार कार्य – आर्य समाज के समाज-सुधार सम्बन्धी मूलभूत कार्य निम्नलिखित हैं –

1.जातीय भेदभाव की समाप्ति के लिए जाति-भेद निवारक संघ की स्थापना की गयी।

2.वेश्यावृत्ति की समाप्ति हेतु आवश्यक कानून बनाने के लिए प्रस्ताव पेश किये गये।

3.बहु-विवाह, बाल-विवाह, सती–प्रथा, पर्दा-प्रथा आदि के विरोध के लिए जनमत तैयार किया गया।

4.आर्यसमाजी पद्धति से सम्पन्न अन्तर्जातीय विवाहों को कानूनसम्मत बनाया गया।

योगदान

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान – आर्य समाज के शिक्षा के क्षेत्र में निम्नलिखित योगदान रहे –

1.समाज के सर्वांगीण विकास और बौद्धिक जागृति के लिए सम्पूर्ण देश में डी०ए०वी० (दयानन्द ऐंग्लो-वेदिक) शिक्षण केन्द्रों की स्थापना की गयी।

2.प्राचीन शिक्षा-पद्धति के आधार पर अनेक गुरुकुल शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की गयी।

3.हरिद्वार में गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी।

राष्ट्रीय भावना का विकास – राष्ट्रीयता की भावना के विकास में आर्य समाज का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वामी दयानन्द ने ही सर्वप्रथम ‘स्वराज्य’ और ‘स्वदेशी’ शब्दों का प्रयोग किया था। हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने वाले पहले व्यक्ति भी वही थे।

आर्य समाज के सिद्धान्त

आर्य समाज के मूलभूत सिद्धान्त अथवा शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं –

1.ईश्वर ही एकमात्र ज्ञान का प्रमुख कारण है। वह सत्य है। विद्या और वे पदार्थ जो विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका मूल परमेश्वर है।

2.ईश्वर सत्यं, शिवं, सुन्दरं, शाश्वत, असीमित, दयावान, अजन्मा, सर्वशक्तिमान, अतुलनीय एवं अपरिवर्तनीय है, अत: उसकी उपासना करनी चाहिए। मूर्तिपूजा निरर्थक है।

3.सत्य को ग्रहण करना चाहिए और असत्य को त्यागने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। सभी कार्य धर्मानुसार अर्थात् उचित-अनुचित और सत्य-असत्य का विचार करके करना चाहिए।

4.अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए, अर्थात् अज्ञान के अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाना चाहिए।

5.सबसे प्रेमपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए।

6.आर्यों का ज्ञान वेदों में संकलित है; अत: प्रत्येक आर्य के लिए वेदों का अध्ययन परम धर्म एवं कर्तव्य है, ऐसा मानकर इनका अध्ययन करना चाहिए।

7.संसार में भलाई का कार्य करना समाज का मुख्य उद्देश्य है; अत: सबको अपनी उन्नति के साथ-साथ अन्य की भी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

8.प्रत्येक व्यक्ति को अपनी उन्नति से ही सन्तुष्ट न होकर सबकी उन्नति को अपनी उन्नति समझना चाहिए।

9.सार्वजनिक कल्याण के विरुद्ध कोई कार्य नहीं  करना चाहिए। 10. ऊँच-नीच, छुआछूत, जाति-पाँति आदि वेदों की मान्यताओं के विरुद्ध हैं। इनका त्याग करना चाहिए।

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प्रश्न 4.

स्वामी विवेकानन्द के जीवन, कार्यों एवं उपदेशों का विवरण दीजिए।

             या

स्वामी विवेकानन्द के जीवन की प्रमुख घटनाओं तथा उनके सामाजिक-धार्मिक योगदान का वर्णन कीजिए।

             या

स्वामी विवेकानन्द को हम क्यों याद करते हैं ? दो कारण लिखिए।

             या

स्वामी विवेकानन्द का परिचय देते हुए उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के सिद्धान्तों और सेवा-कार्यों पर प्रकाश डालिए।

             या

स्वामी विवेकानन्द पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

             या

स्वामी विवेकानन्द कौन थे ? उनकी लोकप्रियता के क्या कारण हैं?

             या

विवेकानन्द के व्यक्तित्व एवं कार्यों पर प्रकाश डालिए। 

             या

रामकृष्ण मिशन की स्थापना के सिद्धान्तों और कार्यों का वर्णन कीजिए। रामकृष्ण मिशन के सेवा कार्यों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर :

धार्मिक और सामाजिक योगदान

स्वामी विवेकानन्द ने ज्ञान और दर्शन से समस्त विश्व को आलोकित किया। 12 जनवरी, 1863 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) के एक सम्पन्न कायस्थ परिवार में इनका जन्म हुआ। इनका बचपन का नाम नरेन्द्रदत्त था। ये बड़ी ही प्रखर बुद्धि के नवयुवक थे। पहले ये पाश्चात्य संस्कृति को उत्तम मानते थे, परन्तु गुरु रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आने पर इनके विचार परिवर्तित हो गये। ये इस निर्णय पर पहुँचे कि सत्य या ईश्वर को जानने का सच्चा मार्ग अनुरागपूर्ण साधना का मार्ग ही है। सन् 1893 ई० में ये शिकागो के सर्वधर्मसम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। इनकी ओजस्वी वाणी से जो विचार प्रस्फुटित हुए उसका सम्मोहन वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति तथा विश्व-जगत् पर छा गया। स्त्री-पुरुष इनकी एक झलक पाने के लिए ही उतावले हो गये। सन् 1897 ई० में इन्होंने धर्म और समाज-सुधार के कार्य को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से वेल्लूर में रामकृष्ण परमहंस मिशन की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से स्वामी विवेकानन्द ने मानवता की सच्चे अर्थों में सेवा की। इन्होंने धार्मिक पाखण्ड, जाति-प्रथा, अस्पृश्यता, बाल-विवाह तथा देवदासी-प्रथा का घोर विरोध किया, किन्तु ये मूर्ति-पूजा के समर्थक थे और मूर्ति पूजा को आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया में एक प्रारम्भिक अवस्था मानते थे। ये बुराई का उन्मूलन शिक्षा द्वारा करना चाहते थे। 14 जुलाई, 1902 ई० में 39 वर्ष की अल्पायु में ही इनका स्वर्गवास हो गया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि “यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकानन्द को पढ़ना चाहिए।’

रामकृष्ण मिशन के सिद्धान्त (उपदेश) निम्नलिखित हैं –

1.ईश्वर निराकार तथा सर्वव्यापक है। वह सभी पर दयालु है। आत्मा ईश्वरीय रूप ही है। ईश्वर की सच्ची उपासना करनी चाहिए। इस ईश्वर की उपासना करते हुए प्रेम-मार्ग में लोक-कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

2.हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता और हिन्दू रहन-सहन सबसे प्राचीनतम है, श्रेष्ठ है, सुन्दर है, शिव है। इसने दूसरों को भी प्रेरणा दी है और संसार का प्रथम शिक्षक भी यही है।

3.प्रत्येक हिन्दू को अपनी सभ्यता और अपने धर्म की सुरक्षा में वृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। तथा पाश्चात्य भौतिक चमक-दमक से दूर रहना चाहिए।

4.प्रत्येक व्यक्ति को सादा, पवित्र व त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए तथा मानवता की सेवा करनी चाहिए।

5.सभी धर्म अच्छे हैं। प्रत्येक मनुष्य को अपने धर्म में आस्था तथा विश्वास रखना चाहिए।

रामकृष्ण मिशन के कार्य – समाज-सुधार को रामकृष्ण मिशन में प्रमुखता दी गयी है। समाज में व्याप्त कुप्रथाओं को दूर करने के लिए सक्रिय प्रयास किये गये हैं। दीन-दुःखियों की सेवा तथा सहायता करने का भी निर्देश दिया गया है। ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन पर भी इस मिशन में बल दिया गया है। इसलिए शिक्षण-संस्थाओं की स्थापना का कार्य यहाँ भी प्रमुख रूप से हुआ। इस मिशन द्वारा विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और सभ्यता का प्रचार किया गया। नवजागरण में यह बहुत ही व्यावहारिक योगदान था। भारत के शिक्षित युवकों पर भी इस मिशन का अच्छा प्रभाव रहा है। देश पर आने वाले संकटों का सामना करने की दशा में भी इस संस्था ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रश्न 5.

किन्हीं दो मुस्लिम-सुधार आन्दोलनों का वर्णन कीजिए। उसका तत्कालीन मुस्लिम समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ?    

या

अलीगढ़ आन्दोलन क्या था ? यह मुस्लिम समुदाय के लिए किस प्रकार लाभकारी था ?

             या

सर सैयद अहमद खाँ ने मुसलमानों में व्याप्त किन कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया ?

             या

अलीगढ़ आन्दोलन के प्रवर्तक कौन थे? इस आन्दोलन ने मुस्लिम समाज को जाग्रत करने में क्या योगदान दिया ?

             या

वहाबी आन्दोलन क्यों प्रारम्भ हुआ ?

             या

अलीगढ़ आन्दोलन का क्या उद्देश्य था? इसके मुख्य प्रवर्तक कौन थे? उनके किसी एक महत्त्वपूर्ण योगदान का उल्लेख कीजिए।

             या

निम्नलिखित मुस्लिम सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए

(क) वहाबी आन्दोलन, (ख) अलीगढ़ आन्दोलन तथा (ग) देवबन्द आन्दोलन।

उत्तर :

प्रारम्भ में जो सुधार आन्दोलन हुए वे प्रायः हिन्दू धर्म और समाज से सम्बन्धित रहे; अत: मुस्लिम समाज उनसे अपेक्षित लाभ न उठा सका। मुस्लिम समाज की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्थिति अच्छी न थी। हिन्दू आन्दोलन की प्रतिक्रियास्वरूप मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण के लिए भी सुधार आन्दोलन प्रारम्भ हुए। इन आन्दोलनों ने जहाँ सामाजिक बुराइयों को दूर करने में योगदान दिया, वहीं भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना के उत्थान में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। ये आन्दोलन निम्नलिखित थे –

(1) सैयद अहमद बरेलवी : वहाबी आन्दोलन

मुस्लिम समाज में अनेक सुधारात्मक आन्दोलन फले-फूले। इनमें वहाबी आन्दोलन एक प्रमुख आन्दोलन था। यह आन्दोलन अठारहवीं शताब्दी में अरब में मुहम्मद अब्दुल वहाब ने आरम्भ किया। भारत में वहाबी आन्दोलन के जन्मदाता सैयद अहमद बरेलवी (1787-1831 ई०) थे। इन्होंने कुरान को जनसाधारण में सरलता से समझाने के लिए उर्दू भाषा में अनूदित करवाया। वहाबी आन्दोलन का उद्देश्ये मुस्लिम जगत् में चेतना, धर्म-सुधार और संगठन उत्पन्न करना रहा। इन्होंने मुसलमानों के जीवन से अनेक बुराइयों को दूर करके इस्लाम धर्म की वास्तविक पवित्रता को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया तथा पाश्चात्य सभ्यता का विरोध किया। इस आन्दोलन के दो प्रमुख उद्देश्य थे-अपने धर्म का प्रचार एवं मुस्लिम समाज में सुधार।

(2) सर सैयद अहमद खाँ : अलीगढ़ आन्दोलन

मुस्लिम समाज में जागृति उत्पन्न करने में सर सैयद अहमद खाँ का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने इस्लामी शिक्षा का गहन अध्ययन किया तथा पाश्चात्य शिक्षा का ज्ञान भी प्राप्त किया। इन्होंने मुस्लिम समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया तथा मुस्लिमों में नवजागरण का कार्य सम्पन्न किया। इनके द्वारा किये गये प्रमुख सुधार-कार्य इस प्रकार थे

1.इन्होंने मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण के लिए अंग्रेजी के अध्ययन पर बल दिया। इसी उद्देश्य से इन्होंने 1875 ई० में अलीगढ़ में ‘मोहम्मडन ऐंग्लो ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना की, जो बाद में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में परिणत हो गया।

2.इन्होंने मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों, रूढ़ियों और धार्मिक अन्धविश्वासों का खुलकर विरोध किया।

3.इस्लाम को मानवतावादी स्वरूप देने का प्रयत्न किया।

4.इन्होंने सभी समुदायों को परस्पर भ्रातृ-भाव से रहने की सलाह दी।

5.इन्होंने स्त्रियों में पर्दा-प्रथा का विरोध किया तथा स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया।

6.अलीगढ़ आन्दोलन के अन्य प्रमुख नेता चिराग अली, अल्ताफ हुसैन, नज़ीर अहमद तथा मौलाना शिवली नोगानी थे। अलीगढ़ आन्दोलन मुस्लिम जगत् में सुधार का महान् आन्दोलन था। ये हिन्दू और मुसलमानों की एकता के भी पक्षपाती थे।

(3) मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी : अहमदिया आन्दोलन

मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी (1838-1908 ई०) ने 1889 ई० में अहमदिया आन्दोलन का सूत्रपात किया। इन पर पाश्चात्य विचारधारा, थियोसॉफिकल सोसायटी और हिन्दुओं के सुधार आन्दोलन को पर्याप्त प्रभाव पड़ा। इनसे प्रभावित होकर इन्होंने इस्लाम धर्म को सरल और व्यापक बनाने के लिए यह आन्दोलन चलाया। इनका सब धर्मों की मौलिक एकता में विश्वास था। ये गैर-मुस्लिम लोगों से घृणा करने और जिहाद के विरुद्ध थे। ये सच्चे धर्म-सुधारक थे। ये पर्दा-प्रथा, बहु-विवाह तथा तलाक के समर्थक थे। इनकी पुस्तक का नाम ‘बराहीन-ए-अहमदिया है। इनके समर्थकों की संख्या बहुत कम थी तथा इन्हें ‘नबी’ के नाम से पुकारा जाता था।

(4) देवबन्द आन्दोलन

एक मुसलमान उलेमा, जो प्राचीन मुस्लिम साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान थे, ने देवबन्द आन्दोलन चलाया। उन्होंने मुहम्मद कासिम तथा रशीद अहमद गंगोही के नेतृत्व में देवबन्द (सहारनपुर, उत्तर प्रदेश) में शिक्षण-संस्था की स्थापना की। इस आन्दोलन के दो मुख्य उद्देश्य रहे-कुरान तथा हदीस की शिक्षाओं का प्रसार करना और विदेशी शासकों के विरुद्ध जेहाद’ की भावना को बनाये रखना। देवबन्द आन्दोलन ने 1885  ई० में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का स्वागत किया। इनके अतिरिक्त नदवा-उल-उलूम (लखनऊ, 1894 ई०, मौलाना शिवली नोगानी), महल-ए-हदीस (पंजाब, मौलाना सैयद नज़ीर हुसैन) नामक मुस्लिम संस्थाओं ने भी मुस्लिम समाज को जाग्रत करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

इन मुस्लिम आन्दोलनों ने मुसलमानों में राजनीतिक तथा सामाजिक चेतना की वृद्धि की; जिसके परिणामस्वरूप मुसलमानों की स्थिति में पर्याप्त सुधार हुए। इन्होंने पाश्चात्य रीति-रिवाजों को देखा और उनके प्रभावस्वरूप मुस्लिम समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को समाप्त कर दिया। इन आन्दोलनों के नेताओं ने नारी-शिक्षा की ओर भी ध्यान देना प्रारम्भ किया। यद्यपि मुसलमानों में इस चेतना के जागने से साम्प्रदायिकता की भावना प्रबल हो गयी और देश में हिन्दू-मुसलमानों के मध्य झगड़े होने लगे, तथापि इन आन्दोलनों के फलस्वरूप ही अनेक देशभक्तों व राष्ट्रीय मुस्लिम नेताओं का उदय भी हुआ।

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प्रश्न 6.

नवजागरण का सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों पर क्या प्रभाव पड़ा ?

             या

नवजागरण के तत्कालीन समाज पर पड़ने वाले चार प्रभावों का वर्णन कीजिए।

             या

उन्नीसवीं शताब्दी में भारतवर्ष में हुए धार्मिक एवं समाज सुधार आन्दोलनों ने किस प्रकार सामाजिक उत्थान में योगदान किया? 

उत्तर :

नवजागरण का प्रभाव नवजागरण का भारतीय समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इसके प्रभाव से समाज का कोई भी अंग अछूता ने रहा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए। भारतीय समाज में एक नयी चेतना, स्फूर्ति और शक्ति का संचार हुआ। नवजागरण के भारतीय समाज पर निम्नलिखित प्रमुख प्रभाव पड़े

1. सामाजिक कुरीतियों में कमी – सुधार आन्दोलन से पहले भारतीय समाज में अनेक बुराइयाँ व्याप्त थीं। सभी सुधारों ने एक स्वर से इन कुरीतियों पर तीव्र प्रहार किया। इन आन्दोलनों से प्रभावित होकर अंग्रेजी सरकार ने कुप्रथाओं  को समाप्त करने के लिए कानून बनाये। सन् 1829 ई० में सती–प्रथा के विरुद्ध कानून बनाया गया तथा 1843 ई० में दास-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया तथा 1856 ई० में विधवाओं को पुनर्विवाह की कानूनी अनुमति मिल गयी। इसी प्रकार बहु-विवाह तथा पर्दा-प्रथा में कमी आयी। छुआछूत के विरुद्ध भी भावनाएँ पनपने लगीं। अत: नवजागरण के फलस्वरूप सामाजिक कुप्रथाओं के विरुद्ध एक सशक्त वातावरण तैयार हो गया।

2. प्राचीन भारतीय साहित्य के अध्ययन में वृद्धि – उन्नीसवीं शताब्दी के सुधार आन्दोलनों का एक प्रमुख प्रभाव यह पड़ा कि भारतवासियों में अपने प्राचीन दर्शन, साहित्य, कला तथा विज्ञान के अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न हुई। देश के प्राचीन इतिहास तथा धार्मिक ग्रन्थों की खोज प्रारम्भ हो गयी, संस्कृत भाषा का तीव्रती से प्रसार हुआ, प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों का बड़े पैमाने पर प्रकाशन किया जाने लगा तथा भारतीय अपने देश के प्राचीन ग्रन्थों को बड़ी रुचि से पढ़ने लगे। इस सम्बन्ध में मैक्समूलर जैसे पाश्चात्य विद्वानों का बड़ा योगदान रहा।

3. भारतीय सभ्यता-संस्कृति के प्रति रुझान – पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के कारण देश के शिक्षित लोग भारतीय सभ्यता-संस्कृति की उपेक्षा करने लगे थे। विभिन्न सुधार आन्दोलनों ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगायी तथा भारतीयों में अपने धर्म, संस्कृति तथा जीवन-दर्शन के प्रति प्रेम उत्पन्न किया। आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन और थियोसॉफिकल सोसायटी के प्रयासों के परिणामस्वरूप भारतीय जनमानस फिर से अपने धर्म तथा संस्कृति पर गर्व करने लगा।

4. बुद्धिवादी दृष्टिकोण का विकास – नवजागरण का एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह हुआ कि शिक्षित लोग धार्मिक, सामाजिक तथा अन्य समस्याओं पर बुद्धि और तर्क के आधार पर विचार करने लगे। अब वे प्राचीन रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं के अन्ध-भक्त नहीं रहे वरन् तार्किक दृष्टि तथा अनुभव के आधार पर समस्याओं के हल ढूंढ़ने लगे।

5. पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा – सर्वप्रथम राजा राममोहन राय के प्रयासों से देश में अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति का प्रारम्भ हुआ। परिणामतः पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान, स्वतन्त्रता, समानता, लोकतन्त्र आदि विचारों से भारतीय परिचित और प्रभावित हुए। पाश्चात्य शिक्षा के कारण भारत में जन-जागरण की शुरुआत हो गयी।

6. धार्मिक आडम्बरों में कमी – नवजागरण के कारण भारतीयों के धार्मिक जीवन में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। सुधार आन्दोलनों ने मूर्तिपूजा तथा धार्मिक कर्मकाण्डों का तीव्र विरोध किया। इससे धार्मिक आडम्बरों में कमी आयी, पुरोहितों का प्रभाव कम हुआ तथा मठों-मन्दिरों में फैले दुराचारों में भी कमी आयी।

7. स्त्रियों की दशा में सुधार – समाज-सुधार आन्दोलनों के परिणामस्वरूप स्त्रियों की दशा में बहुत सुधार हुआ। सती–प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध आदि पर रोक लगाये जाने तथा विधवाओं को पुनर्विवाह की अनुमति मिलने से स्त्रियों का समाज में सम्मान बढ़ा। सभी सुधारकों ने स्त्री-शिक्षा पर विशेष बल दिया। इन आन्दोलनों के फलस्वरूप भारतीय स्त्रियों ने आगे चलकर स्वतन्त्रता-संग्राम में पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर योगदान दिया।

8. साहित्य का विकास – साहित्य के क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने नवजागरण एवं नवोत्थान की भावनाओं का सूत्रपात किया। अपने ‘भारत दुर्दशा’ नामक नाटक में इन्होंने विदेशी शासन से उत्पन्न दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया। बंकिमचन्द्र चटर्जी ने ‘आनन्दमठ’ की रचना करके भारतीय नवजागरण तथा राष्ट्रीय नवचेतना में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। इनके द्वारा रचित ‘वन्देमातरम्’ गीत राष्ट्रीय जागृति का महान् प्रेरक बना। अनेकानेक साहित्यकारों ने भारतीय भाषाओं में रचनाएँ करके देश की मान-मर्यादा एवं साहित्य की गरिमा को बढ़ाया।

9. राष्ट्रीय एकता तथा देशभक्ति की भावना का उदय – तत्कालीन सुधार आन्दोलन तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक व्यवस्था को सुधारने के लिए किये गये थे, किन्तु उन्होंने राष्ट्रीयता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। नवजागरण के फलस्वरूप लोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना जाग्रत हुई। वे जाति, भाषा, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि के भेदभाव को भुलाकर अपने को भारतवासी मानने लगे। इससे राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार हुआ, जिसने धीरे-धीरे देश-प्रेम तथा देश-भक्ति की भावना को जन्म दिया। लोगों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भावनाएँ जोर पकड़ती गयीं। राष्ट्रीयता की यही भावना भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की आधारशिला बनी। हजारों भारतीय नवयुवक देश की स्वाधीनता हेतु अपने प्राण भी देने के लिए तैयार हो गये। परिणामस्वरूप मई, 1857 ई० में मेरठ में क्रान्ति के प्रारम्भ होने के बाद स्वाधीनता संग्राम धीरे-धीरे समूचे देश में फैल गया।

प्रश्न 7.

भारत में राष्ट्रीयता के उदय पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।

उत्तर :

भारत में राष्ट्रीयता का उदय

भारत में चले सुधार आन्दोलनों के द्वारा समाज में चले आ रहे अन्धविश्वासों, कुरीतियों एवं कुप्रथाओं को दूर करने का निरन्तर प्रयास किया गया। नवजागरण ने अंग्रेजों द्वारा शोषित भारतीयों के मन में असन्तोष व क्रोध की भावना का संचार किया। धीरे-धीरे भारतीयों के हृदय में आत्मविश्वास तथा नवचेतना पैदा हुई। इस नवचेतना ने राष्ट्रीयता की भावना को जन्म दिया, जिससे प्रेरणा प्राप्त कर भारतवासी अपने देश की स्वतन्त्रता की माँग करने लगे।

आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन भारत पर अंग्रेजों द्वारा किए गए अधिकार की चुनौती का उत्तर था। विदेशी शासन द्वारा पैदा की गई परिस्थितियों ने भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावना का विकास किया। जिसका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष परिणाम भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन की परिस्थितियों का निर्माण था।

कारण-अंग्रेजी शासन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर अत्यन्त विनाशकारी प्रभाव पड़ा। अंग्रेजों की आर्थिक शोषण की नीति’ ने भारतीय कुटीर उद्योग, कृषि एवं व्यापार को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप भारतीय बेरोजगार हो गए एवं उनकी अर्थव्यवस्था खस्ता हाल होने लगी।

वास्तव में प्रशासनिक सुविधाएँ, सैनिक रक्षा के उद्देश्य, आर्थिक व्यापार तथा व्यापारिक शोषण की बालों को ध्यान में रखते हुए ही परिवहन के तीव्र साधनों की अनेक योजनाएँ बनीं। सन् 1853 ई० में लॉर्ड डलहौजी द्वारा शुरू की गई रेल प्रणाली के विकास के साथ-ही-साथ परिवहन के अन्य साधनों ने प्रान्तों को नगरों से तथा नगरों को गाँवों से जोड़ दिया गया। इससे भारतीयों में विचारों का परस्पर आदान-प्रदान होने लगा।

सन् 1850 ई० के बाद शुरू हुई आधुनिक डाक-व्यवस्था तथा बिजली के तार ने देश को एक करने में सहायता की। अन्तर्देशीय-पत्र, समाचार-पत्र तथा पार्सलों को कम दर में भेजने की व्यवस्था ने देश के सामाजिक, शैक्षणिक, बौद्धिक तथा राजनीतिक जीवन में एक भारी परिवर्तन ला दिया। डाकखानों के द्वारा राष्ट्रीय साहित्य पूरे देश में भेजा जा सकता था।

लॉर्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी कार्य; जैसे—दिल्ली दरबार, वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट, आर्क्स ऐक्ट, ICS की परीक्षा की आयु 21 वर्ष करना, द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध आदि ने राष्ट्रीयता के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।

भारत के सबसे लोकप्रिय वायसराय लॉर्ड रिपन के समय में इल्बर्ट बिल पारित हुआ। परन्तु इस अधिनियम की यूरोपियों में हुई कटु प्रतिक्रिया के कारण वायसराय द्वारा इसे वापस लेना पड़ा। इसका भारतीय जनता पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा।

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प्रश्न 8.

भारत में राष्ट्रीयता के उदय के कारणों पर प्रकाश डालिए।

             या

सन् 1857 ई० से 1885 ई० के मध्य भारत में राष्ट्रीय चेतना के विकास के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए। 

             या

भारत में राष्ट्रीय जागृति के उद्भव के उत्तरदायी कारणों की विवेचना कीजिए।

             या

राष्ट्रीय जागरण के तीन सामाजिक तथा तीन राजनैतिक कारण लिखिए 

             या

उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में राजनीतिक चेतना के विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए। 

उत्तर :

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का तेजी से विकास हुआ, जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

1. अंग्रेजों द्वारा आर्थिक शोषण – पहले ईस्ट इण्डिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश शासन ने भारतीय लोगों का भरपूर आर्थिक शोषण किया। दोषपूर्ण भूमि-कर व्यवस्था के कारण किसानों को अपनी भूमि-सम्पत्ति से वंचित होना पड़ा। नव-जमींदार र्ग कृषित भूमि का वास्तविक स्वामी बन बैठा। अकाल आदि प्राकृतिक प्रकोपों ने निर्धन जनता पर अत्यधिक बोझ डाल दिया। दस्तकार तथा शिल्पकार बेरोजगार हो गये। उद्योगपति और व्यापारी वर्ग को भी आर्थिक क्षति हुई। इन भयंकर परिस्थितियों में लोगों में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा हुआ। वे ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ने के लिए कृतसंकल्प हो गये।

2. देश को प्रशासनिक एकीकरण – अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा के लिए देश को राजनीतिक एकता के सूत्र में बाँधा। इससे भारत एक राष्ट्र के रूप में उदित हुआ। देश की जनता में अंग्रेजों के प्रशासन तथा शोषण के विरुद्ध एके राष्ट्रीय दृष्टिकोण का उदय तथा विकास हुआ।

3. पाश्चात्य चिन्तन तथा शिक्षा – पाश्चात्य शिक्षा के माध्यम से भारतीय लोग पाश्चात्य चिन्तन से | परिचित हुए, जिससे लोगों में राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ। पाश्चात्य दार्शनिकों, विचारकों तथा लेखकों के विचारों ने भारतीयों में स्वतन्त्रता, समानता, लोकतन्त्र तथा देशभक्ति की भावनाओं का संचार किया।

4. सांस्कृतिक विरासत – अपने अतीत का पुनरीक्षण करके कुछ भारतीयों में अपनी पुरातन सांस्कृतिक विरासत से गर्व तथा त्य-सन्तोष को अन्डी भावना जाग्रत हुई। इस भावना के कारण कुछ ले नवीन विचारधाराओं तथा प्रवृत्ति से विमुख अवश्य हुए, किन्तु साथ ही विदेशियों से स्वयं को मुक्त करने का उत्साह भी उनमें जागा।

5. सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन – राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, सैयद अहमद खाँ आदि हिन्दू तथा मुस्लिम समाज-सुधारकों ने अनेक सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन चलाये। इन आन्दोलनों से भारतीय लोगों में नवजीवन का संचार हुआ, उनमें सामाजिक तथा राजनीतिक चेतना जागी।

6. जातीय भेदभाव तथा ईसाई धर्म में अन्तरण – अंग्रेजों ने जातिभेद की नीति अपनायी तथा भारतीय लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए अनेक प्रलोभन दिये। इस जबरदस्ती धर्मान्तरण के कारण भारतीयों के | हृदय में क्षोभ तथा अपमान की भावनाएँ पैदा हुईं। परिणामस्वरूप वे अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध जाग्रतहुए।

7. ब्रिटिश प्रशासन –लॉर्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी शासनकाल में वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट, आर्स ऐक्ट आदि नये विनियमों ने भारतीयों के हृदय में अंग्रेजों के शासन के प्रति रोष पैदा किया। लॉर्ड रिपन के काल में इल्बर्ट बिल के विरुद्ध यूरोपीय लोगों की जातीय कटुता को देख भारतीय लोग चकित रह गये। इन अनुभवों ने भारतीयों को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होकर आन्दोलन के लिए तैयार किया।

8. प्रेस की भूमिका – उन्नीसवीं शताब्दी में अमृत बाजार पत्रिका, केसरी, हिन्द, ट्रिब्यून आदि समाचार-पत्र और पत्रिकाओं ने जनता में राष्ट्रवादी विचारधारा को फैलाने में बहुत योगदान दिया। प्रेस ने अंग्रेजों की अन्याय तथा भेदभावपूर्ण नीतियों का खण्डन करके भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। तिलक ने ‘केसरी’ के माध्यम से लोगों में अथाह धैर्य और साहस का संचार किया। देश के विभिन्न भागों के नेताओं तथा लोगों को परस्पर एक सूत्र में बाँधते हुए प्रेस ने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को गति दी।

9. अन्तर्राष्ट्रीय जागरण का प्रभाव – विश्व के अनेक देशों में स्वतन्त्रता के लिए संग्राम हुए और वे स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफल भी हुए। इन सभी अन्तर्राष्ट्रीय जागरण की घटनाओं से भारतीयों में भी राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।

10. भारतीयों के साथ भेदभाव – भारतीयों को अंग्रेजों के समान अधिकार प्रदान नहीं किये गये थे। राज्यों के उच्च पदों पर भारतीयों को अनेक आधारों पर अयोग्य बताते हुए नियुक्त नहीं किया जाता था। ऐसी सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ 1869 ई० में और अरविन्द  घोष के साथ 1877 ई० में हुआ। भारतीयों के साथ इस प्रकार का भेदभाव अपनाये जाने से बुद्धिजीवी वर्ग में अत्यधिक असन्तोष पैदा हुआ और वे राष्ट्रीय जागरण के कार्य में लग गये।

प्रश्न 9.

भारतीय उदारवादियों के कार्यक्रम तथा उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।

             या

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में ए०ओ० ह्युम नामक अंग्रेज क्यों रुचि ले रहे थे?

             या

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किस प्रकार हुई ? आरम्भ में इसके उद्देश्य, कार्यक्रम तथा कार्य-प्रणाली क्या थी ?

             या

प्रारम्भ में कांग्रेस के क्या उद्देश्य थे ? इसकी प्रारम्भिक नीति को उदारवादी नीति क्यों कहा जाता है ? इसका परित्याग करके उग्र राष्ट्रवाद की नीति क्यों अपनायी गयी ?

             या

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक चरण में उदारवादियों का आधिपत्य था।” इस कथन की विवेचना कीजिए। या

उदारवादी नेताओं के प्रमुख उद्देश्यों को लिखिए।

             या

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसने की थी ? आरम्भ में इसके क्या उद्देश्य थे? भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन उद्देश्य लिखिए।

             या

अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब, कहाँ और किसके द्वारा की गयी? इसके तीन मुख्य उद्देश्य लिखिए। 

             या

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब और कहाँ की गयी? इसके प्रमुख उद्देश्य क्या थे? 

             या

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब की गयी? इसके प्रथम अध्यक्ष कौन थे? इसके प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर :

सन् 1885 ई० में भारतीय सिविल सर्विस के रिटायर्ड अधिकारी सर ए०ओ० ह्युम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की दिशा में पहल की। इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को यह प्रेरणा दी कि वे एक ऐसी संस्था का निर्माण करें जो भारतीयों के सामाजिक, राजनीतिक तथा आध्यात्मिक जीवन का उत्थान कर सके। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन ने भी इस दिशा में सहयोग दिया, क्योंकि इस प्रकार की संस्था से भारतीयों की  इच्छा तथा कार्यक्रमों का पता चलता रहता और ब्रिटिश सरकार उचित कार्रवाई करके 1857 ई० की क्रान्ति जैसी अप्रिय घटना की पुनरावृत्ति न होने देती। सन् 1884 ई० में मद्रास (चेन्नई) में दीवान बहादुर रघुनाथ राय के निवास पर एक अखिल भारतीय संस्था की स्थापना की योजना बनी, जिसके फलस्वरूप 1885 ई० में इस संस्था की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में हुई। कांग्रेस की स्थापना में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयब जी आदि ने भी सहयोग दिया। कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 1885 ई० में व्योमेशचन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में बम्बई में हुआ था। द्वितीय अधिवेशन 1886 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में तथा तीसरा अधिवेशन मद्रास(चेन्नई) में बदरुद्दीन तैयब जी की अध्यक्षता में हुआ था।

सन् 1885-1905 ई० में उदारवादियों के उद्देश्य तथा कार्यक्रम

कांग्रेस के आरम्भिक दौर में नरमपन्थी नेताओं; जैसे-दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले आदि का प्रभुत्व बना रहा। उनके उद्देश्य तथा कार्य निम्नलिखित थे

1.उन्होंने विधानसभाओं की शक्तियों के विस्तार तथा स्वशासन में प्रशिक्षण की माँग की।

2.उन्होंने आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत गरीबी को दूर करने के लिए कृषि का विकास करने, भू-राजस्व कम करने तथा उद्योगों के विस्तार की माँग की।

3.उन्होंने प्रशासकीय सेवाओं के उच्च पदों का भारतीयकरण करने की माँग की।

4.उन्होंने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए भाषण तथा प्रेस की स्वतन्त्रता की माँग की।

इस प्रकार भारतीय नेताओं ने राष्ट्रीय जागृति पैदा की तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनमत तैयार किया। इन मेताओं ने एक राजनीतिक तथा आर्थिक कार्यक्रम देकर देशवासियों को एक ही मंच से राष्ट्रीय संघर्ष करने के लिए तैयार किया।

उदारवादियों की कार्यप्रणाली

1.अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इन नेताओं ने शान्तिपूर्ण संवैधानिक तरीके अपनाये।

2.उन्हें ब्रिटिश शासकों की न्यायप्रियता पर पूरा विश्वास था; अत: उन्होंने ब्रिटिश शासकों से मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखा।

3.वे संवैधानिक सुधारों में विश्वास करते थे; अतः वे याचिकाएँ, अपीलें, निवेदन-पत्र आदि ब्रिटिश सरकार को इस आशा से भेजते थे कि वह उन पर सहानुभूतिपूर्ण ढंग से विचार करेगी तथा उनकी माँगों को स्वीकार करेगी। इसी कारण इनकी कार्यप्रणाली तथा नीतियों को उदारवादी नीति कहा जाता है। कुछ अन्य विद्वान इन उदारवादी नेताओं की कार्यप्रणाली को ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ की संज्ञा भी देते हैं।

उपलब्धियाँ

ब्रिटिश सरकार ने नरमपन्थियों से कोई सहयोग नहीं किया; अतः ये नेता अपने उद्देश्य की प्राप्ति में विफल रहे। इसलिए 1905 ई० के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन की बागडोर गरमपन्थी नेताओं के हाथों में चली गयी, जो क्रान्तिकारी साधनों द्वारा अपना उद्देश्य प्राप्त करना चाहते थे।

उग्र राष्ट्रवाद की नीति अपनाने के कारण – उदारवादी युग की 20 वर्षों की लम्बी अवधि में भी कांग्रेस लोगों में जागृति पैदा करने में सफल न हो सकी। उदारवादी आन्दोलन की सफलता अंग्रेजों की सहानुभूति और दया पर निर्भर थी। कांग्रेस को आन्दोलन जनता का आन्दोलन न था।

उदारवादियों ने सरकार से रियायतें माँगीं, स्वतन्त्रता नहीं। इसको आधार बलिदान नहीं था। बंकिम चन्द्र चटर्जी ने इस आन्दोलन को भिक्षावृत्ति की संज्ञा दी। लाला लाजपत राय ने लिखा कि 20 वर्षों के आन्दोलन के बाद भी रोटी के स्थान पर अंग्रेजों से पत्थर ही मिले।

उदारवादी अंग्रेजी ताज के प्रति भक्ति-भाव रखते थे। उनकी एक और गलती यह थी कि उनका विश्वास था कि यदि अंग्रेज भारत से चले गये तो भारतीय हितों की हानि होगी। उदारवादी लोगों की आकांक्षाओं को समझ न सके। वे यह भी न समझ सके कि भारतीयों और अंग्रेजों के हित एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसलिए बिना लड़े अंग्रेज अपने अधिकारों को छोड़ने को तैयार न थे।

सन् 1915 ई० तक उदारवादी नेताओं का कांग्रेस पर पूरा अधिकार था, परन्तु धीरे-धीरे उग्रवादी नेताओं ने उनके नेतृत्व को चुनौती दी और अन्ततः 1923 ई० में उदारवादी युग पूरी तरह समाप्त हो गया।

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प्रश्न 10.

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गांधी का क्या योगदान था ? 

             या

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये आन्दोलनों का मूल्यांकन कीजिए। 

             या

भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गांधी जी द्वारा चलाये गये तीन प्रमुख आन्दोलनों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर :

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गांधी का योगदान प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन ने बहुत जोर पकड़ लिया। इसी समय महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रवेश किया और वे शीघ्र ही राष्ट्रवादियों के सर्वप्रिय नेता बन गये। सन् 1920 ई० से 1947 ई० तक इन्होंने अपनी असाधरण योग्यता से स्वतन्त्रता आन्दोलन का नेतृत्व किया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गांधी की भूमिका अद्वितीय है। इसी कारण 1919 ई० से 1947 ई० तक के काल को ‘गांधी युग’ कहा जाता है। गांधी जी का समस्त आन्दोलन सत्य, अहिंसा, शान्तिपूर्ण विरोध तथा साधने व साध्य के औचित्य पर आधारित था। महात्मा गांधी का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान निम्नलिखित है

1. असहयोग आन्दोलन – यह महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये आन्दोलनों में प्रथम महत्त्वपूर्ण आन्दोलन था। पंजाब में हो रही नृशंस घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से गांधी जी ने 1920 ई० में असहयोग आन्दोलन का आरम्भ किया। इस आन्दोलन का उद्देश्य सरकार से किसी भी प्रकार का सहयोग न करना था। इसका आरम्भ गांधी जी ने अपनी ‘केसरे-हिन्द’ की उपाधि को गवर्नर जनरल को लौटाकर किया। जनता ने भी बड़ा उत्साह दिखाया। सैकड़ों व्यक्तियों ने अपनी-अपनी उपाधियाँ त्याग दीं। हजारों छात्रों ने स्कूल तथा कॉलेज छोड़ दिये। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलायी गयी। चुनावों, सरकारी नौकरियों, संस्थाओं तथा उत्सवों का बहिष्कार किया गया। गांधी जी के आह्वान पर प्रिंस ऑफ वेल्स (ब्रिटेन के युवराज) के भारत आगमन पर उनका देश-भर में बहिष्कार किया गया। 5 फरवरी, 1922 ई० को चौरी-चौरा गाँव में हुई हिंसात्मक घटना से दुःखी होकर गांधी जी ने इस आन्दोलन को स्थगित कर दिया। इस आन्दोलन के स्थगित होने पर सरकार ने राजद्रोह के आरोप में गांधी जी को 6 वर्ष के लिए बन्दी बना लिया।

2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन – सन् 1929 ई० में कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति’ को अपना लक्ष्य घोषित किया। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए गांधी जी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन का प्रारम्भ महात्मा गांधी ने गुजरात के डाण्डी नामक स्थान पर नमक बनाकर सरकार के नमक-कानून को तोड़कर किया। सन् 1931 ई० में गांधी-इर्विन समझौता हुआ। गांधी जी ने आन्दोलन स्थगित करके द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार किया, किन्तु वार्ता के विफल होने पर पुनः आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया गया। यह आन्दोलन 1934 ई० तक चलता रहा।

3. व्यक्तिगत सत्याग्रह – अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों को द्वितीय विश्वयुद्ध में नेताओं के साथ कोई परामर्श किये बिना ही धकेल दिया था। परिणामतः 1940-41 ई० में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सरकार के इस कदम का विरोध करने हेतु सत्याग्रह आन्दोलन चलाया गया था।

4. भारत छोड़ो आन्दोलन – 8 अगस्त, 1942 ई० को कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पास किया गया। गांधी जी ने देशवासियों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया, किन्तु अगले दिन 9 अगस्त की सुबह ही महात्मा गांधी तथा अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इन गिरफ्तारियों की जनता में भयंकर प्रतिक्रिया हुई और समस्त भारत में प्रदर्शन, हड़तालें, तोड़फोड़, सरकारी इमारतों को आग लगाना, थानों व पुलिस चौकियों पर हमले आदि घटनाएँ हुईं। अनेक स्थानों पर विद्रोहियों ने अस्थायी नियन्त्रण कायम कर लिया। यद्यपि अंग्रेज सरकार आन्दोलन को कुचलने में सफल हो गयी तथापि पाँच वर्ष बाद ही वह भारत को छोड़ने के लिए विवश हुई। यह एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन था, जिसका श्रेय मुख्यतया महात्मा गांधी को प्राप्त है।

5. भारत का विभाजन तथा स्वतन्त्रता की प्राप्ति – 3 जून, 1947 ई० को लॉर्ड माउण्टबेटन ने घोषणा की कि 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत का विभाजन कर दिया जाएगा। यद्यपि कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार कर लिया, किन्तु गांधी जी ने इसका विरोध किया। भारत के विभाजन के समय महात्मा गांधी ने बंगाल (नोआखाली) में साम्प्रदायिक आधार पर होने वाले रक्तपात को रोका। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-आन्दोलन बनाया तथा ब्रिटिश साम्राज्यवादी शिकंजे से भारत को मुक्त कराने में अद्वितीय योगदान दिया। केवल यही नहीं अपितु हिन्दू-मुस्लिम एकता, हरिजनोद्धार, महिलाओं की  स्थिति में सुधार, स्वदेशी भावना का प्रचार आदि महात्मा गांधी की अन्य महत्त्वपूर्ण देन हैं। राष्ट्र को अभूतपूर्व योगदान के कारण ही महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाता है।

प्रश्न 11.

भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के योगदान पर प्रकाश डालिए। उसका क्या परिणाम हुआ ?

या

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में सुभाषचन्द्र बोस तथा उनळी आजाद हिन्द फौज की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

या

सुभाषचन्द्र बोस पर टिप्पणी लिखिए।

 या

भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में सुभाषचन्द्र बोस के योगदान की विवेचना कीजिए। 

उत्तर :

सुभाषचन्द्र बोस को जन्म 23 जनवरी, 1897 ई० में कटक में हुआ था। वे जन्मजात क्रान्तिकारी थे। भारत के स्वतन्त्रता के इतिहास में सुभाषचन्द्र बोस का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी आई०सी०एस० की नौकरी को छोड़कर सुभाष राष्ट्रीय आन्दोलन में कूद पड़े। असहयोग आन्दोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने गांधी जी को पूरा सहयोग दिया। प्रिंस ऑफ वेल्स के बहिष्कार आन्दोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया, जिस कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें दिसम्बर, 1921 ई० में 6 महीने के लिए जेल भेज दिया।

जब गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया तो सुभाषचन्द्र बोस को बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने गांधी जी का साथ छोड़ दिया। इसके बाद वे स्वराज्य पार्टी की स्थापना के कार्य में लग गये। सन् 1924 ई० में सरकार ने उन पर क्रान्तिकारी षड्यन्त्र का आरोप लगाकर उन्हें बन्दी बना लिया। सन् 1929 ई० में उन्हें रिहा कर दिया गया। सन् 1929 ई० में जब कांग्रेस ने अपना उद्देश्य पूर्ण स्वराज्य घोषित किया तो वे फिर से कांग्रेस में सम्मिलित हो गये।

सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस की उदारवादी नीति से बहुत असन्तुष्ट थे, क्योंकि वे सशस्त्र क्रान्ति के पक्ष में थे। इस बीच वे बीमार पड़ गये और इलाज के लिए यूरोप चले गये। सन् 1936 ई० में भारत लौटने पर उन्होंने पुनः स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। सन् 1938 ई० में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये, किन्तु कुछ , समय पश्चात् कांग्रेस से अलग हो गये और ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक एक नया संगठन बनाया।

ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें सरकार विरोधी होने का आरोप लगाकर जेल भेजा गया तथा बाद में घर पर ही नजरबन्द कर दिया गया। सन् 1941 ई० में सुभाष ब्रिटिश सरकार को चकमा देकर भारत से बाहर चले गय और अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुँच गये। जापानी सहायता से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए फरवरी, 1943 ई० में वे जापान पहुँचे। जापानी सरकार की सहायता से उन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ को गठन किया और अपने अनुयायियों को जयहिन्द’ का नारा दिया। भारत को स्वतन्त्रता दिलाने हेतु उनकी सेना ने उत्तर-पूर्व की ओर से भारत पर आक्रमण कर दिया। आजाद हिन्द फौज आगे बढ़ती हुई असम तक आ पहुँची, किन्तु उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान हार गया। इसके परिणामस्वरूप आजाद हिन्द फौज को जापान से सहायता मिलनी बन्द हो गयी और उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। उन्हीं दिनों एक वायुयान दुर्घटना में सुभाष जी की मृत्यु हो गयी।

परिणाम – डॉ० वी०पी० वर्मा के अनुसार, “एक राजनीतिक कार्यकर्ता तथा नेता के रूप में बोस ओजस्वी राष्ट्रवाद के समर्थक थे। देशभक्ति उनके व्यक्तित्व का सार तथा उनकी आत्मा की उच्चतम अभिव्यक्ति थी। ऐसे राष्ट्रवादी नेता के संघर्ष का परिणाम उत्साहवर्धक ही होना था।

उनके द्वारा गठित आजाद हिन्द फौज का नारा–“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”- युवाओं में स्वाधीनता की भावना तीव्र करने में मील का पत्थर साबित हुआ। सुभाषचन्द्र बोस क्रान्तिकारी और राष्ट्रवादी नेता थे। उनके प्रयासों से भारतीयों में राजनीतिक चेतना तीव्रतम रूप में अभिव्यक्त हुई। वे इतने अच्छे वक्ता थे कि जो भी उनको सुनता राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत हो पक्का देशभक्त बन जाता।

सुभाषचन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज का भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में बड़ा  महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत की आजादी के लिए उन्होंने जो बलिदान किये उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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प्रश्न 12.

गरम दल के प्रमुख नेताओं ‘लाल-बाल-पाल’ के कार्यों एवं योगदान का मूल्यांकन कीजिए।

या

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर टिप्पणी लिखिए।

या

लाल-बाल-पाल से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर :

लाल-बाल-पाल कांग्रेस के तीन प्रमुख नेताओं की एक तिकड़ी थी। ये तीनों नेता कांग्रेस की उग्र या गरम विचारधारा के नेता थे। इनका विचार था कि ब्रिटिश सरकार से स्वराज्य या कोई अन्य सुविधा, उग्रवादी विद्रोह करके ही प्राप्त की जा सकती है। इन्होंने 1907 ई० में कांग्रेस की भिक्षावृत्ति की नीति से असन्तुष्ट होकर कांग्रेस का विभाजन करते हुए उग्रवादी दल का निर्माण किया। लाला लाजपत राय (लाल) पंजाब में सक्रिय थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (बाल) महाराष्ट्र में तथा बिपिनचन्द्र पाल (पाल) बंगाल में सक्रिय थे। इन सभी ने अपने क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभायी। इनका जीवन-परिचय तथा योगदान निम्नलिखित है –

1. लाला लाजपत राय – पंजाब केसरी लाला लाजपत राय स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रमुख कर्णधार थे। इनका जन्म 28 जनवरी, 1865 ई० को पंजाब के फिरोजपुर जिले में हुआ था। आप एक पत्रकार, वकील, शिक्षाशास्त्री, राजनीतिक नेता, समाज-सुधारक तथा सच्चे देशभक्त थे। इन्होंने लोकमान्य तिलक के साथ मिलकर क्रान्तिकारी आन्दोलन का संचालन किया। पंजाब में सामाजिक सुधारों के कार्यों को भी इन्होंने शुरू किया। सन् 1896 ई० में आपने इंग्लैण्ड जाकर वहाँ की जनता को भारतीयों के कष्टों से अवगत कराया। सन् 1905 ई० में इन्होंने कांग्रेस के माध्यम से स्वतन्त्रता आन्दोलन का कार्य शुरू किया था। ये सक्रिय आन्दोलन के कारण कई बार जेल भी गये। सन् 1923 ई० में आप केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्य चुने गये। सन् 1928 ई० के साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में एक जुलूस का नेतृत्व करते समय इन्हें पुलिस की लाठी से घातक चोट लग गयी थी। 17 नवम्बर, 1928 ई० को इनका देहान्त हो गया।

2. बाल गंगाधर तिलक – बाल गंगाधर तिलक भारत के महान् राष्ट्रीय नेता थे। इनका जन्म 23 जुलाई, 1856 ई० को महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ये उग्र विचारधारा के समर्थक थे, इसलिए कांग्रेस में गरम दल के जन्मदाता थे। इनका कहना था कि, ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। और हम उसे लेकर रहेंगे।’ इन्होंने दो समाचार-पत्र ‘मराठा’ और ‘केसरी’ निकाले तथा महाराष्ट्र में ‘शिवाजी उत्सव’ और ‘गणपति उत्सव’ का शुभारम्भ किया। अपने त्याग, तपस्या और देशभक्ति से वे’लोकमान्य’ बन गये। सन् 1893 ई० के अकाल और प्लेग के समय इन्होंने पीड़ितों की बहुत सेवा की। इन्होंने जनता में राष्ट्रीय चेतना जाग्रत की, भिक्षावृत्ति का विरोध किया, भारतीय संस्कृति व जीवन-मूल्यों की पुनः स्थापना की तथा विभिन्न आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया। जन-आन्दोलन चलाने के कारण इन्हें जेल में बन्द कर दिया गया। सन् 1914 ई० में ये जेल से मुक्त होकर बाहर आये। इसके बाद होमरूल आन्दोलन के कर्णधार बन गये। इन्होंने स्वराज्य की महत्ता पर विशेष बल दिया था। तिलक जी 1918 ई० में इंग्लैण्ड भी गये। वहाँ से लौटने के बाद ये अधिकांशतः बीमार रहने लगे और 1 अगस्त, 1920 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया।

3. बिपिनचन्द्र पाल – बिपिनचन्द्र पाल का जन्म 7 नवम्बर, 1858 ई० को हबीगंज (वर्तमान में बांग्लादेश) में हुआ था। इन्होंने राष्ट्र के दलों को इस प्रकार संगठित करने की बात कही जिससे कोई भी शक्ति, जो हमारे मुकाबले में आये, हमारी इच्छा के सामने दबने को मजबूर हो जाए। इनका मानना था कि हमें अंग्रेजी सरकार को पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए। यदि हम सरकार को नौकरी करने वाले आदमी न दें तो हम सरकार की कार्यप्रणाली को असम्भव बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त भी प्रशासन की कार्य-पद्धति को कई तरह से असम्भव बनाया जा सकता है।

सन् 1907 ई० में बिपिनचन्द्र पाल ने मद्रास (चेन्नई) प्रान्त का दौरा किया और स्वराज्य का नारा बुलन्द किया। उन्हें 6 महीने जेल में रखा गया था, क्योंकि उन्होंने अरविन्द घोष के विरुद्ध गवाही देने से मना कर दिया था। जेल से रिहा होते ही उन्होंने एक सार्वजनिक सभा की, स्वराज्य का झण्डा फहराया और प्रत्येक विदेशी वस्तु का बहिष्कार करने का निश्चय किया। वास्तव में, बिपिनचन्द्र पाल खुले आम सरकार की सत्ता की अवहेलना करने के पक्षधर थे। वे भारतीयों के मन से ब्रिटिश सरकार का भय निकालकर, उनमें स्वदेशी की भावना का संचार करना चाहते थे। 20 मई, 1932 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया।

प्रश्न 13.

मुस्लिम लीग की स्थापना कब हुई ? इसकी नीतियों का वर्णन कीजिए। इसका क्या प्रभाव पड़ा ?

या

मुस्लिम लीग के दो मुख्य उद्देश्यों की विवेचना कीजिए। उसकी नीति के किन्हीं तीन परिणामों का वर्णन कीजिए।

या

मुस्लिम लीग के मुख्य सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए। भारतीय राजनीति में उसके प्रभाव की विवेचना कीजिए।

उत्तर :

मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 ई० में हुई, जो अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का परिणाम थी। भारत में राष्ट्रवादी आन्दोलन के उदय को ब्रिटिश सरकार ने अपने साम्राज्य के लिए बहुत बड़ा खतरा माना। उन्होंने देश में राष्ट्रीय भावना को रोकने के लिए भारतीयों को धार्मिक आधार पर बाँटने की नीति अपनायी। अंग्रेजों ने मुसलमानों का हिमायती बनकर यह कहना शुरू कर दिया कि कांग्रेस में तो हिन्दुओं का बाहुल्य है और राष्ट्रीय आन्दोलन मुसलमानों के हित में नहीं है। उन्होंने मुसलमानों को अलग प्रतिनिधित्व देने का लालच दिया तथा मुसलमान जमींदारों व नवशिक्षित युवकों को अपने पक्ष में कर लिया और उन्हीं के द्वारा मुसलमानों में पृथकतावादी भावनाओं का संचार किया। अंग्रेज मुसलमानों को अपना पृथक् राजनीतिक संगठन बनाने के लिए उकसाते रहे। साम्प्रदायिकता तथा पृथकतावादी प्रवृत्तियों के पराकाष्ठा पर पहुँच जाने पर 1906 ई० में ढाका ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।

दो उद्देश्य-आगा खाँ के नेतृत्व में स्थापित मुस्लिम लीग के दो प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे –

भारतीय राजनीति में मुसलमानों का पृथक् अस्तित्व कायम करना उनके लिए पृथक् निर्वाचन-प्रणाली की माँग करना और उन्हें अधिक-से-अधिक प्रतिनिधित्व दिलाने का प्रयास करना।

मुसलमानों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रभाव से बचाना और मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा और भ्रातृभाव उत्पन्न करना।

मुस्लिम लीग एक प्रतिक्रियावादी संस्था थी तथा इस पर मुसलमान राजाओं, जमींदारों, उद्योगपतियों तथा ऐसे व्यक्तियों का नियन्त्रण था, जो ब्रिटिश सरकार के पिट्ठू थे। उसका कोई रचनात्मक कार्यक्रम नहीं था तथा उसकी नीति मात्र कांग्रेस को नीचा दिखाने तथा मुसलमानों को हिन्दुओं से पृथक् करने की थी। इस नीति के निम्नलिखित तीन प्रभाव सामने आये

1. स्वतन्त्रता संग्राम पर प्रभाव – भारतीय मुस्लिम लीग की गतिविधियों का देश के स्वतन्त्रता संग्राम पर गहरा प्रभाव पड़ा। मुस्लिम लीग की हठधर्मिता तथा पृथकतावादी प्रवृत्तियों के कारण स्वतन्त्रता प्राप्ति में देर हुई।

2. हिन्दू-मुस्लिम एकता का अहित – सन् 1857 ई० के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में हिन्दू और मुसलमानों ने कन्धे-से-कन्धा मिलाकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया था। अंग्रेज इस हिन्दू-मुस्लिम एकता को अपने लिए खतरा समझते थे। लीग की नीतियों ने हिन्दू-मुसलमानों को पृथक् करने का निन्दनीय कार्य किया और उनके बीच घृणा के बीज बोये।

3. देश का विभाजन – यद्यपि 1911-13 ई० के दौरान कुछ घटनाओं; जैसे-बंगाल-विभाजन; के कारण मुस्लिम लीग ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हो गयी और उसके बाद कई वर्षों तक मुस्लिम लीग ने राष्ट्रीय आन्दोलन में कांग्रेस का साथ दिया, किन्तु बाद में मुस्लिम लीग फिर कांग्रेस के विरुद्ध हो गयी और दोनों में बराबर खींचातानी चलती रही। मुस्लिम लीग की प्रतिक्रियावादी तथा साम्प्रदायिकता की नीति के कारण ही 1947 ई० मे भारत का विभाजन और पाकिस्तान का निर्माण हुआ।

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