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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 यूरोप में राष्ट्रवाद का विकास (अनुभाग – एक) विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

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प्रश्न 1.

फ्रांस की क्रान्ति का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों पर किस प्रकार पड़ा?

उत्तर

फ्रांस की क्रान्ति का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों पर निम्नलिखित रूप में पड़ा

1.इस क्रान्ति ने सदियों से चली आ रही यूरोप की पुरातन व्यवस्था (Ancient Regime) का अन्त कर दिया।

2.इस क्रान्ति की महत्त्वपूर्ण देन मध्यकालीन समाज की सामन्ती व्यवस्था का अन्त करना था।

3.फ्रांस के क्रान्तिकारियों द्वारा की गई ‘मानव अधिकारों की घोषणा’ (27 अगस्त, 1989 ई०), मानव जाति की स्वाधीनता के लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण थी।

4.इस क्रान्ति ने समस्त यूरोप में राष्ट्रीयता  की भावना का विकास और प्रसार किया। परिणामस्वरूप यूरोप के अनेक देशों में क्रान्तियों का सूत्रपात हुआ।

5.फ्रांस की क्रान्ति ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा को जन्म दिया।

6.इस क्रान्ति ने लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

7.फ्रांसीसी क्रान्ति ने मानव जाति को स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व का नारा प्रदान किया।

8.इस क्रान्ति ने इंग्लैंड, आयरलैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों की विदेश नीति को प्रभावित किया।

9.कुछ विद्वानों के अनुसार फ्रांस की क्रान्ति समाजवादी विचारधारा का स्रोत थी, क्योंकि इसने समानता का सिद्धान्त प्रतिपादित कर समाजवादी व्यवस्था का मार्ग भी खोल दिया था।

10.इस क्रान्ति के फलस्वरूप फ्रांस ने कृषि, उद्योग, कला, साहित्य, राष्ट्रीय शिक्षा तथा सैनिक गौरव के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की।

प्रश्न 2.

जर्मनी का एकीकरण कैसे हुआ ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

सन् 1848 ई० के यूरोप में राष्ट्रवाद का स्वरूप बदलने लगा था और यह जनतन्त्र एवं क्रान्ति के सैलाब से दूर हो गया था। राज्य की सत्ता को बढ़ाने और पूरे यूरोप पर राजनीतिक प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए रूढ़िवादियों ने अकसर राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रयोग किया। उस समय जर्मनी तथा इटली के एकीकृत होने की प्रक्रिया जितनी कठिन थी उतनी ही भयावह भी थी। इस प्रक्रिया के बाद ही इटली तथा जर्मनी राष्ट्र-राज्य बन सके थे।

ज्ञातव्य है कि राष्ट्रवादी भावनाएँ मध्यमवर्गीय जर्मन लोगों में घर कर गयी थीं और उन्होंने सन् 1848 ई० में जर्मन महासंघ के विभिन्न भागों को जोड़कर एक निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयत्न किया था। मगर राष्ट्र-निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही और फौज की शक्ति ने मिलकर दबा दी, जिनका प्रशा के बड़े भूस्वामियों (Junkers) ने भी समर्थन किया। उसके पश्चात् प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण  के आन्दोलन की बागडोर सँभाली। उसका मन्त्री प्रमुख ऑटोवान बिस्मार्क इसे प्रक्रिया का जनक था, जिसने प्रशा की सेना और नौकरशाही की सहायता ली। सात वर्ष के दौरान ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस से तीन युद्धों में प्रशा को विजय प्राप्त हुई और एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई। जनवरी, 1871 में, वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया।

जनवरी 18, 1871 ई० को प्रात: कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। ऐसे मौसम में; वर्साय का शीशमहल जो कि पहले से ही बेहद सर्द रहता था; जर्मन राजकुमारों, सेना के प्रतिनिधियों और मन्त्री प्रमुख ऑटोवान बिस्मार्क सहित प्रशा के महत्त्वपूर्ण मन्त्रियों ने एक सभा का आयोजन किया। सभा ने प्रशा के काइजर विलियम प्रथम के नेतृत्व में नये जर्मन साम्राज्य की घोषणा की। प्रशा राज्य की शक्ति के प्रभुत्व के दर्शन जर्मनी में उसके राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में हुए। नये राज्य ने जर्मनी की मुद्रा, बैंकिंग और कानूनी तथा न्यायिक व्यवस्थाओं के आधुनिकीकरण पर अधिक जोर दिया और प्रशा द्वारा उठाये गये कदम और उसकी कार्यवाहियाँ शेष जर्मनी के लिए एक मॉडल बने।

प्रश्न 3.

इटली के एकीकरण हेतु क्या प्रयास किये गये ? विस्तार से लिखिए। या इटली के एकीकरण में मेत्सिनी, काबूर और गैरीबाल्डी के योगदान को वर्णन कीजिए। 

           या

इटली के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तीन नेताओं के नाम लिखिए। 

उत्तर

उन्नीसवीं सदी के मध्य में इटली सात राज्यों में विभक्त था। इसके निर्माण में भी जर्मनी की तरह बहुत-सी मुसीबतें उठायी गयीं। इसे भी राजनीतिक विखण्डन का एक लम्बा इतिहास देखना पड़ा था, जैसा कि जर्मनी में हुआ था। इटली कई वंशानुगत तथा बहुराष्ट्रीय हैब्सबर्ग साम्राज्य में बिखरा पड़ा था। इनमें से केवल सार्डिनिया-पीडमॉण्ट में एक इतालवी राजघराने का शासक था। उत्तरी भाग ऑस्ट्रियाई हैब्सबर्गों के अधीन था, मध्य इलाकों पर पोप का शासन था और दक्षिणी क्षेत्र स्पेन के बूबू राजाओं के अधीन थे। इतालवी भाषा ने भी साझा रूप प्राप्त नहीं किया था और अभी तक उसके विविध क्षेत्रीय और स्थानीय रूप उपस्थित थे।

इटली को एकीकृत कर गणराज्य बनाने में ज्युसेप मेसिनी; जो एक महान् क्रान्तिकारी भी था; ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। उसने सन् 1830 ई० के दशक में एक सुविचारित कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जिसके लिए उसने एक गुप्त संगठन यंग इटली नाम से बनाया था। वह अपने विचारों को उक्त संगठन के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचाना चाहता था। सन् 1831 ई० और 1848 ई० में क्रान्तिकारी विद्रोह हुए जिनकी असफलता के कारण इतालवी राज्यों को जोड़ने को उत्तरदायित्व सार्डिनिया-पीडमॉण्ट के शासक विक्टर इमैनुअल द्वितीय पर आ गया। इस क्षेत्र के अभिजात वर्ग की नजरों में एकीकृत इटली उनके लिए आर्थिक विकास और राजनीतिक प्रभुत्व की सम्भावनाएँ उत्पन्न करता था।

मन्त्री प्रमुख काबूर जिसने इटली को एकीकृत करने के लिए आन्दोलन का नेतृत्व किया था, वह न तो क्रान्तिकारी था और न ही जनतान्त्रिक। वह इटली के अन्य धनवान तथा शिक्षित लोगों की तरह फ्रेंच भाषी था। फ्रांस से सार्डिनिया-पीडमॉण्ट की एक चालाक कूटनीतिक सन्धि; जिसके पीछे काबूर का हाथ था; से सार्डिनिया-पीडमॉण्ट 1859 ई० में ऑस्ट्रियाई ताकतों को हरा पाने में कामयाब हुआ।

नियमित सैनिकों के अतिरिक्त ज्युसेपे गैरीबाल्डी के नेतृत्व में भारी संख्या में सशस्त्र स्वयंसेवकों ने इस युद्ध में भाग लिया। सन् 1860 ई० में वे दक्षिण इटली और दो सिसलियों के राज्य में प्रवेश कर गये और स्पेनी शासकों को हटाने के लिए स्थानीय कृषकों का समर्थन प्राप्त करने में सफल रहे।

सन् 1861 ई० में इमैनुअल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया। मगर इटली के अधिकतर निवासी जिनमें निरक्षरता की दर पर्याप्त ऊँची थी, अभी भी उदारवादी-राष्ट्रवादी विचारधारा से अनभिज्ञ थे।

प्रश्न 4.

राष्ट्रवाद से क्या तात्पर्य है? यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय होने में कौन-सी परिस्थितियाँ सहायक हुईं? उनमें से किन्हीं दो को समझाकर लिखिए। 

           या

राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय गौरव को किस प्रकार उत्तेजित किया ?

           या

यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय के क्या कारण थे ?

उत्तर

राष्ट्र की सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकती। राष्ट्र बहुत हद तक एक ऐसा समुदाय होता है जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास, भावनाओं, आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा होता है। यह कुछ खास मान्यताओं  पर आधारित होता है जिन्हें लोग उस समुदाय के लिए गढ़ते हैं जिससे वे अपनी पहचान कायम करते हैं। राष्ट्र के प्रति यही भावना राष्ट्रवाद’ कहलाती है।

यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय ने जनता के हृदय में राष्ट्रीय भावनाएँ उत्पन्न कीं। वे भावनाएँ अग्रलिखित हैं –

1. पुनर्जागरण एवं धर्म-सुधार आन्दोलन – आधुनिक यूरोप के इतिहास में पुनर्जागरण एक युगान्तरकारी घटना थी। सोलहवीं शताब्दी तक समस्त यूरोप में सामन्ती व्यवस्था लागू होने से समस्त समाज त्राहि-त्राहि कर रहा था। रूढ़िवादियों का प्रबल जोर था। चर्च की अपनी राजनीतिक व्यवस्था अलग थी। इन सब दुष्प्रभावों से मानव-जीवन अभिशप्त हो गया था। मनुष्य एक विचारशील प्राणी होने के कारण सामन्तवाद तथा चर्च के बन्धनों से मुक्त होने के उपाय सोचने लगा। तुर्को की कुस्तुनतुनिया विजय ने दार्शनिकों एवं विचारकों को इटली में शरण लेने के लिए। बाध्य किया, जहाँ पर इन विद्वानों को भरपूर संरक्षण प्राप्त हुआ। इसी बौद्धिक वर्ग ने परलोकवाद तथा धर्मवाद के स्थान पर मानववाद का प्रचार किया, जिससे यूरोप में राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। यही परिवर्तन यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय का कारण बने।

2. व्यापारिक पुनरुत्थान एवं भौगोलिक खोजें – नाविकों द्वारा नये-नये समुद्री मार्गों की खोज ने समस्त यूरोप में एक अप्रत्याशित क्रान्ति ला दी। इन मार्गों के खोज लेने से लोगों को एक-दूसरे के देश में जाने, वहाँ की सभ्यता एवं संस्कृति को समझने के अवसर प्राप्त हुए। एक-दूसरे देश को आपस में व्यापार करने का अवसर प्राप्त हुआ। आर्थिक स्थिति में भी पर्याप्त सुधार हुआ। इस प्रकार नवीन भौगोलिक खोजों से यूरोपवासी अनेक उन्नत प्राचीन सभ्यताओं के सम्पर्क में आये, जिससे यूरोप में नवीन विचारों का उदय हुआ जो कि राष्ट्रवाद के उदय का एक प्रमुख कारण बना।

3. फ्रांस की क्रान्ति – सन् 1789 ई० में हुई फ्रांस की क्रान्ति विश्व की एक महानतम घटना है। इस क्रान्ति के समय फ्रांस की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा बड़ी दयनीय थी, जिस कारण देश में असन्तोष तथा अराजकता का वातावरण फैला हुआ था, जो शीघ्र ही क्रान्ति के रूप में फूट निकला। यह क्रान्ति एक ऐसी बाढ़ थी जो अपने साथ अनेक बुराइयों को बहाकर ले गयी। इस क्रान्ति ने यूरोप में राजनीतिक क्रान्ति के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक क्रान्ति को जन्म दिया। इस क्रान्ति ने पुरातन व्यवस्था का अन्त कर राष्ट्रीयता की भावना को विकसित किया। इसी से प्रेरित होकर जर्मनी, इटली एवं पोलैण्ड जैसे देशों में राष्ट्रवाद का विकास हुआ।

4. नेपोलियन के प्रशासनिक सुधार – हालाँकि नेपोलियन बाद में फ्रांस का तानाशाह बन गया था। लेकिन प्रारम्भ में उसने फ्रांस का नक्शा ही बदलकर रख दिया। उसने प्रशासनिक क्षेत्र में क्रान्तिकारी सिद्धान्तों का समावेश किया, जिससे पूरी व्यवस्था अधिक तर्कसंगत एवं कुशल बन सके। सन् 1804 ई० की नागरिक संहिता; जिसे आमतौर पर नेपोलियन संहिता के नाम से जाना जाता था; ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिये थे। उसने कानून के समक्ष समानता और सम्पत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया। नेपोलियन ने सामन्ती व्यवस्था को समाप्त कर दिया, किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलायी। नेपोलियन के समय में ही कारीगरों पर श्रेणी-संघों के नियन्त्रणों को हटा दिया गया, यातायात और संचार-व्यवस्थाओं को सुधारा गया। इससे किसानों, कारीगरों,  मजदूरों और नये उद्योगपतियों ने नयी आजादी का आनन्द उठाया। नेपोलियन के प्रशासनिक सुधारों के कारण एकीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। विदेशी शासन के विरुद्ध उसके राष्ट्रवादी एवं राष्ट्रव्यापी युद्धों का भी राष्ट्रवाद के उदय में विशेष योगदान है।

5. बौद्धिक क्रान्ति – अठारहवीं सदी की बौद्धिक क्रान्ति से भी राष्ट्रीयता की भावना को अत्यधिक बल मिला। इस काल में चिन्तन का केन्द्र मनुष्य था। मानववादी होने के कारण चिन्तनकर्ताओं ने मानव की गरिमा, उसके अधिकारों एवं आदर्शों को प्राथमिकता दी। बौद्धिक क्रान्ति की जागृति उत्पन्न करने वालों में रूसो, मॉण्टेस्क्यू तथा वाल्टेयर जैसे महान् दार्शनिक तथा दिदरो एवं क्वेसेन जैसे महान् लेखक थे। इनके विचारों का यूरोप की जनता पर भारी प्रभाव पड़ा जो कि राष्ट्रवाद के उदय का एक प्रमुख कारण था।

6. औद्योगिक क्रान्ति – उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में औद्योगिक क्रान्ति के कारण पूँजीवाद का आधार तैयार हुआ। पूँजीवाद के विकास से यूरोपीय साम्राज्यवाद में बदलाव आया और अन्तत: राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों का उद्भव हुआ।

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